★ बच्चे का नाम उसके जन्म के समय और स्थान के हिसाब से रखने का महत्व।
जब एक बच्चा जन्म लेता है। तब सौरमंडल की ज्यामितींय स्थिति के आधार पर। ब्रह्मांड पर भी गौर करने का एक तरीका है, पर वो काफी जटिल है। कम से कम सौरमंडल की ज्यामितींय स्थिति पर गौर करके, लोग ये तय करते हैं कि ये ध्वनि सबसे अच्छी होगी। उस बच्चे के लिए, जिसने इस दिन, इस समय पर जन्म लिया है।
इसका एक वैज्ञानिक आधार है। लेकिन इसमें कुछ गुंजाइश भी है, क्योंकि संस्कृत वर्णमाला में 54 अक्षर है। इन अक्षरों को सैकड़ों छोटी ध्वनियों में तोड़ा जा सकता है। उन छोटी ध्वनियों के आधार पर लोगों का नाम रखना बहुत जटिल है। जब उनको नया नाम देने की बात आती है। अगर वो ब्रह्मचर्य या सन्यास लेते हैं। उन्हें नया नाम देते समय हम थोड़ा ज्यादा ध्यान देते हैं। जन्म के आधार पर नहीं। बल्कि उनके कुछ पहलुओं को देखते हुए और वो दीक्षा को कैसे ग्रहण करते हैं, इसके आधार पर हम नाम को व्यवस्थित करेंगे। ताकि उस नाम या ध्वनि का उससे मेल हो।
अर्थ नहीं, अर्थ कोई मायने नहीं रखता। आप जो चाहे, वो अर्थ बना सकते हैं। अब हमें आपके बच्चे को इस तरह का नाम देना होगा कि जब भी आप उस नाम को पुकारते हैं, उसके अंदर कुछ ना कुछ ढी़ला हो जाए। लेकिन अगर आप उसका "अनिरोध" रखते हैं। वो देश के बाहर जाएगा या भारत में भी अगर आप बेंगलुरु जाते हैं तो लोग आपको "एनडी" कहेंगे। ठीक है.. अगर आप उसका नाम "जनक" रखेंगे, तो वो उसे "जैक" कहेंगे। तो हमें नहीं पता कि वो उसका कैसा नया नाम रखेंगे, ऐसा होगा।
कुछ हद तक ये महत्वपूर्ण है। अगर आप मोक्ष की खोज में है तो जो नाम आप बोलते हैं। जिस ध्वनि का आप उच्चारण करते हैं। वो महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय समाज में लड़कों के नाम रखने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। बजाय, लड़कियों के। क्योंकि किसी लिंगभेद की वजह से नहीं, क्योंकि आपको उसी पट्ठे के साथ रहना है। लड़की तो किसी और की परेशानी है। क्योंकि बेटा आपके आस-पास ही रहेगा, आपकी आखरी सांस तक। जब आप मर रहे हैं। अगर आप अपने बेटे को बुलाना चाहे, तो आप कहेंगे, "शिवा"। अगर वो "सैम" है, तो क्या करें।
इसलिए माता-पिता भी ध्यान देते हैं, कि हम तो लगातार, क्योंकि हो सकता है कि वो अक्सर अपने नाम का खुद इस्तेमाल ना करें। परंतु हमें तो ये नाम बार-बार पुकारना पड़ेगा। इसीलिए ये परिवार की ज्यामिति के अनुसार होना चाहिए। मगर वो ये नहीं जानते, कि लड़की को क्या नाम दें; क्योंकि वो अभी तक ये नहीं जानते कि वो किससे शादी करेगी।
आमतौर पर शादी के समय लड़की का नाम बदल दिया जाता था। आप जानते हैं। करीब 25 साल पहले तक अधिकतर महिलाओं का शादी के समय नाम बदल दिया जाता था। पति का नाम देखकर, उसके गुणों के आधार पर या ग्रहों की ज्यामिति के आधार पर नाम बदला जाता था, ताकि वो मेल खाएं।
आजकल ये अपमानजनक माना जाता है। मैं अपना नाम क्यों बदलूँ। ये जरूरी नहीं है। क्योंकि ये हर चीज का शोषण करने के लिए प्रयोग किया जाने लगा है। उसके वजह से हर चीज के लिए प्रतिरोध आ जाता है। अगर इसे सही तरीके से किया जाता तो सभी इसे स्वीकार करते। जब इसे सही और उचित तरीके से नहीं किया जाता, तो ये परेशानी बन जाता है।
संस्कृत वर्णमाला, सृष्टि की गहरी समझ से आती है, क्योंकि ये भाषा बोलचाल के लिए नहीं बनी थी। ये केवल बोलचाल के लिए, हमारे द्वारा बनाई गई भाषा नहीं है। इस भाषा को लोगों ने अस्तित्व से ही निकाला है। इस भाषा का विकास सृष्टि को देखकर हुआ, ना कि कल्पना करके।
कई मायनों में जिन ध्वनियों का आप उच्चारण करते हैं, और जिन आकारों का जिक्र करने के लिए, आप उन ध्वनियों का उपयोग करते हैं, या जुड़े हुए हैं। मंत्र का यही अर्थ है। मंत्र का अर्थ है, एक ध्वनी। एक शुद्ध ध्वनि। यंत्र यानी, उससे जुड़ा हुआ आकार।
कई मायनों में जिन ध्वनियों का आप उच्चारण करते हैं, और जिन आकारों का जिक्र करने के लिए, आप उन ध्वनियों का उपयोग करते हैं, या जुड़े हुए हैं। मंत्र का यही अर्थ है। मंत्र का अर्थ है, एक ध्वनी। एक शुद्ध ध्वनि। यंत्र यानी, उससे जुड़ा हुआ आकार।
इसे समझने के लिए अगर आप फिजिक्स के बारे में कुछ जानते हैं। कम से कम अगर आपने हाई स्कूल में फिजिक्स पड़ी है। तो आपने ध्वनि के बारें में कम से कम 1 चैप्टर तो पढ़ा ही होगा। अगर आप किसी कोसिलोस्कोप में ध्वनि डालते हैं, जो ध्वनि को मापने का यंत्र है। तो उस आवाज की फ्रीक्वेंसी, उसकी एमपी ट्यूड और बाकी पैमानों के हिसाब से, ये हर बार आपको एक खास आकार दिखाएगा। तो एक ध्वनि के साथ एक रूप जुड़ा होता है। इसी तरह से एक रुप के साथ एक ध्वनी जुड़ी होती है।
जब एक बच्चा जन्म लेता है। तब सौरमंडल की ज्यामितींय स्थिति के आधार पर। ब्रह्मांड पर भी गौर करने का एक तरीका है, पर वो काफी जटिल है। कम से कम सौरमंडल की ज्यामितींय स्थिति पर गौर करके, लोग ये तय करते हैं कि ये ध्वनि सबसे अच्छी होगी। उस बच्चे के लिए, जिसने इस दिन, इस समय पर जन्म लिया है।
इसका एक वैज्ञानिक आधार है। लेकिन इसमें कुछ गुंजाइश भी है, क्योंकि संस्कृत वर्णमाला में 54 अक्षर है। इन अक्षरों को सैकड़ों छोटी ध्वनियों में तोड़ा जा सकता है। उन छोटी ध्वनियों के आधार पर लोगों का नाम रखना बहुत जटिल है। जब उनको नया नाम देने की बात आती है। अगर वो ब्रह्मचर्य या सन्यास लेते हैं। उन्हें नया नाम देते समय हम थोड़ा ज्यादा ध्यान देते हैं। जन्म के आधार पर नहीं। बल्कि उनके कुछ पहलुओं को देखते हुए और वो दीक्षा को कैसे ग्रहण करते हैं, इसके आधार पर हम नाम को व्यवस्थित करेंगे। ताकि उस नाम या ध्वनि का उससे मेल हो।
अर्थ नहीं, अर्थ कोई मायने नहीं रखता। आप जो चाहे, वो अर्थ बना सकते हैं। अब हमें आपके बच्चे को इस तरह का नाम देना होगा कि जब भी आप उस नाम को पुकारते हैं, उसके अंदर कुछ ना कुछ ढी़ला हो जाए। लेकिन अगर आप उसका "अनिरोध" रखते हैं। वो देश के बाहर जाएगा या भारत में भी अगर आप बेंगलुरु जाते हैं तो लोग आपको "एनडी" कहेंगे। ठीक है.. अगर आप उसका नाम "जनक" रखेंगे, तो वो उसे "जैक" कहेंगे। तो हमें नहीं पता कि वो उसका कैसा नया नाम रखेंगे, ऐसा होगा।
कुछ हद तक ये महत्वपूर्ण है। अगर आप मोक्ष की खोज में है तो जो नाम आप बोलते हैं। जिस ध्वनि का आप उच्चारण करते हैं। वो महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय समाज में लड़कों के नाम रखने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। बजाय, लड़कियों के। क्योंकि किसी लिंगभेद की वजह से नहीं, क्योंकि आपको उसी पट्ठे के साथ रहना है। लड़की तो किसी और की परेशानी है। क्योंकि बेटा आपके आस-पास ही रहेगा, आपकी आखरी सांस तक। जब आप मर रहे हैं। अगर आप अपने बेटे को बुलाना चाहे, तो आप कहेंगे, "शिवा"। अगर वो "सैम" है, तो क्या करें।
इसलिए माता-पिता भी ध्यान देते हैं, कि हम तो लगातार, क्योंकि हो सकता है कि वो अक्सर अपने नाम का खुद इस्तेमाल ना करें। परंतु हमें तो ये नाम बार-बार पुकारना पड़ेगा। इसीलिए ये परिवार की ज्यामिति के अनुसार होना चाहिए। मगर वो ये नहीं जानते, कि लड़की को क्या नाम दें; क्योंकि वो अभी तक ये नहीं जानते कि वो किससे शादी करेगी।
आमतौर पर शादी के समय लड़की का नाम बदल दिया जाता था। आप जानते हैं। करीब 25 साल पहले तक अधिकतर महिलाओं का शादी के समय नाम बदल दिया जाता था। पति का नाम देखकर, उसके गुणों के आधार पर या ग्रहों की ज्यामिति के आधार पर नाम बदला जाता था, ताकि वो मेल खाएं।
आजकल ये अपमानजनक माना जाता है। मैं अपना नाम क्यों बदलूँ। ये जरूरी नहीं है। क्योंकि ये हर चीज का शोषण करने के लिए प्रयोग किया जाने लगा है। उसके वजह से हर चीज के लिए प्रतिरोध आ जाता है। अगर इसे सही तरीके से किया जाता तो सभी इसे स्वीकार करते। जब इसे सही और उचित तरीके से नहीं किया जाता, तो ये परेशानी बन जाता है।
तो हमेशा से बेटे का नाम नामकरण एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया रही है, क्योंकि आपको उसी के साथ रहना है। आजकल वो दूर चले जाते हैं, तो चले जाते हैं। लेकिन उन दिनों वो मरते दम तक आपके साथ रहते थे। इसलिए ये जरूरी था, जो नाम आप पुकारे वो परिवार के जो ज्योमेट्री के क्वेश्चन में फिट हो।
बच्चों के नामकरण के पीछे का विज्ञान
Reviewed by Tarun Baveja
on
July 22, 2020
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July 22, 2020
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